Saturday, August 30, 2025
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लाखों की ठगी के साइबर गिरोह इंदौर से गिरफ्तार, सॉफ्टवेयर इंजीनियर निकला मास्टरमाइंड, जानिए कैसे लोगों को लगाते थे चूना…

बिलासपुर। साइबर ठगी के बढ़ते मामलों पर नकेल कसते हुए बिलासपुर पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। लगभग 60 लाख रुपए की ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले में पुलिस ने इंदौर से चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इस पूरे गिरोह का सरगना सॉफ्टवेयर इंजीनियर निकला, जिसने दिल्ली के प्रतिष्ठित एनआईआईटी संस्थान से पढ़ाई की है।

पुलिस की विशेष टीम ने आरोपियों के कब्जे से ठगी में उपयोग किए गए 4 मोबाइल फोन, 7 एटीएम कार्ड, 1 यूपीआई कार्ड, 2 पैन कार्ड, एक चेकबुक और 2 पासबुक बरामद किए हैं। इनसे यह साफ जाहिर होता है कि गिरोह बड़े पैमाने पर संगठित तरीके से ऑनलाइन धोखाधड़ी को अंजाम देता था।

दरअसल, यह मामला उस समय सामने आया जब प्रार्थिया अल्पना जैन ने सिविल लाइन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि आरोपियों ने उन्हें शेयर मार्केट और ऑनलाइन ट्रेडिंग के नाम पर डिमेट अकाउंट खुलवाकर भारी मुनाफे का झांसा दिया। निवेश के लिए लगातार अलग-अलग बैंक खातों में रकम जमा कराई गई और इसी दौरान 59 लाख 87 हजार 994 रुपए की ठगी कर ली गई।

पुलिस महानिरीक्षक डॉ. संजीव शुक्ला और एसएसपी रजनेश सिंह के मार्गदर्शन में रेंज साइबर थाना निरीक्षक रविशंकर तिवारी के नेतृत्व में विशेष टीम बनाई गई। इस टीम ने तकनीकी साक्ष्यों की मदद से लगातार तीन दिनों तक महू, जिला इंदौर के अलग-अलग ठिकानों पर दबिश दी और आखिरकार चारों आरोपियों—ललित कुमार, अर्पित साल्वे, कमलजीत सिंह चौहान और रोहित निशाद—को गिरफ्तार कर लिया।

पूछताछ में आरोपियों ने कबूल किया कि वे ‘गणेशम सिक्योरिटी’ नामक फर्जी एजेंसी के जरिए लोगों को ठगते थे। निवेशकों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि उनका पैसा गोल्ड ट्रेडिंग और शेयर मार्केट में लगाया जा रहा है। लाभांश का फर्जी आंकड़ा दिखाकर पीड़ितों को और अधिक रकम निवेश करने के लिए उकसाया जाता था।

पुलिस जांच में यह भी खुलासा हुआ कि गिरोह का मास्टरमाइंड ललित कुमार सॉफ्टवेयर इंजीनियर होने के नाते फर्जी वेबसाइट और एप्लीकेशन तैयार करता था। इन्हीं के जरिए लोगों को फंसाया जाता था। महू और राऊ इलाके के स्थानीय साथियों से कमीशन पर बैंक खाते लिए जाते थे, जिनका उपयोग ठगी की रकम ट्रांसफर करने और नगदी निकालने में किया जाता था। काम खत्म होने के बाद आरोपी मोबाइल सिम और एटीएम कार्ड नष्ट कर देते थे, ताकि पुलिस तक उनकी पहचान न पहुंच सके।

गिरफ्तारी के बाद सभी आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड में लाकर न्यायालय के समक्ष पेश किया गया और न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है। पुलिस अब गिरोह से जुड़े अन्य लोगों और खातों की जांच कर रही है। माना जा रहा है कि इस नेटवर्क का दायरा कई राज्यों तक फैला हो सकता है।

यह कार्रवाई न केवल बिलासपुर पुलिस की सतर्कता को दर्शाती है बल्कि यह भी साफ करती है कि साइबर ठग कितने संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम हो चुके हैं। ऐसे में आम नागरिकों को भी किसी भी प्रकार के ऑनलाइन निवेश या मुनाफे के झांसे से सावधान रहने की जरूरत है।

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बिलासपुर। साइबर ठगी के बढ़ते मामलों पर नकेल कसते हुए बिलासपुर पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। लगभग 60 लाख रुपए की ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले में पुलिस ने इंदौर से चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इस पूरे गिरोह का सरगना सॉफ्टवेयर इंजीनियर निकला, जिसने दिल्ली के प्रतिष्ठित एनआईआईटी संस्थान से पढ़ाई की है। पुलिस की विशेष टीम ने आरोपियों के कब्जे से ठगी में उपयोग किए गए 4 मोबाइल फोन, 7 एटीएम कार्ड, 1 यूपीआई कार्ड, 2 पैन कार्ड, एक चेकबुक और 2 पासबुक बरामद किए हैं। इनसे यह साफ जाहिर होता है कि गिरोह बड़े पैमाने पर संगठित तरीके से ऑनलाइन धोखाधड़ी को अंजाम देता था। दरअसल, यह मामला उस समय सामने आया जब प्रार्थिया अल्पना जैन ने सिविल लाइन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि आरोपियों ने उन्हें शेयर मार्केट और ऑनलाइन ट्रेडिंग के नाम पर डिमेट अकाउंट खुलवाकर भारी मुनाफे का झांसा दिया। निवेश के लिए लगातार अलग-अलग बैंक खातों में रकम जमा कराई गई और इसी दौरान 59 लाख 87 हजार 994 रुपए की ठगी कर ली गई। पुलिस महानिरीक्षक डॉ. संजीव शुक्ला और एसएसपी रजनेश सिंह के मार्गदर्शन में रेंज साइबर थाना निरीक्षक रविशंकर तिवारी के नेतृत्व में विशेष टीम बनाई गई। इस टीम ने तकनीकी साक्ष्यों की मदद से लगातार तीन दिनों तक महू, जिला इंदौर के अलग-अलग ठिकानों पर दबिश दी और आखिरकार चारों आरोपियों—ललित कुमार, अर्पित साल्वे, कमलजीत सिंह चौहान और रोहित निशाद—को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में आरोपियों ने कबूल किया कि वे ‘गणेशम सिक्योरिटी’ नामक फर्जी एजेंसी के जरिए लोगों को ठगते थे। निवेशकों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि उनका पैसा गोल्ड ट्रेडिंग और शेयर मार्केट में लगाया जा रहा है। लाभांश का फर्जी आंकड़ा दिखाकर पीड़ितों को और अधिक रकम निवेश करने के लिए उकसाया जाता था। पुलिस जांच में यह भी खुलासा हुआ कि गिरोह का मास्टरमाइंड ललित कुमार सॉफ्टवेयर इंजीनियर होने के नाते फर्जी वेबसाइट और एप्लीकेशन तैयार करता था। इन्हीं के जरिए लोगों को फंसाया जाता था। महू और राऊ इलाके के स्थानीय साथियों से कमीशन पर बैंक खाते लिए जाते थे, जिनका उपयोग ठगी की रकम ट्रांसफर करने और नगदी निकालने में किया जाता था। काम खत्म होने के बाद आरोपी मोबाइल सिम और एटीएम कार्ड नष्ट कर देते थे, ताकि पुलिस तक उनकी पहचान न पहुंच सके। गिरफ्तारी के बाद सभी आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड में लाकर न्यायालय के समक्ष पेश किया गया और न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है। पुलिस अब गिरोह से जुड़े अन्य लोगों और खातों की जांच कर रही है। माना जा रहा है कि इस नेटवर्क का दायरा कई राज्यों तक फैला हो सकता है। यह कार्रवाई न केवल बिलासपुर पुलिस की सतर्कता को दर्शाती है बल्कि यह भी साफ करती है कि साइबर ठग कितने संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम हो चुके हैं। ऐसे में आम नागरिकों को भी किसी भी प्रकार के ऑनलाइन निवेश या मुनाफे के झांसे से सावधान रहने की जरूरत है।