Wednesday, February 11, 2026
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गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में 72 कर्मचारियों का 15 साल से लंबा संघर्ष: हाईकोर्ट–सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद प्रबंधन नहीं कर रहा नियमित

बिलासपुर। गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) के 72 कर्मचारियों का 15 वर्षों से न्याय पाने का संघर्ष अब भी जारी है। ये कर्मचारी एलडीसी और एमटीएस पदों पर कार्यरत हैं और 1997 से दैनिक वेतनभोगी के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। जब विश्वविद्यालय केंद्रीय विश्वविद्यालय बना, तब शासन के सामान्य प्रशासन विभाग और विश्वविद्यालय के आदेश के अनुसार 2008 में इन कर्मचारियों को नियमित कर वेतनमान प्रदान किया गया।

मार्च 2009 तक कर्मचारियों को नियमित वेतनमान मिलने के बाद, विश्वविद्यालय ने अचानक अप्रैल 2009 से इन्हें फिर से दैनिक वेतनभोगी मान लिया। कर्मचारियों ने इस फैसले को चुनौती दी और हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसके बाद 15 साल से लंबित इस मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से कर्मचारियों के पक्ष में लगातार आदेश आए, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन अभी तक उन्हें नियमितीकरण और आर्थिक लाभ देने में विफल रहा।

हाईकोर्ट ने 6 मार्च 2023 को कर्मचारियों के पक्ष में आदेश देते हुए 26 अगस्त 2008 से नियमितीकरण का लाभ देने का निर्देश दिया। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू याचिकाएं दायर कीं, जिन्हें 12 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कर्मचारियों का आरोप है कि प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों का पालन नहीं कर रहा है।

इस लंबी लड़ाई में कर्मचारियों की मुश्किलें लगातार बढ़ीं। 15 वर्षों में 8 कर्मचारियों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि 31 मई 2025 को रिटायर होने वाले 18 कर्मचारियों को बिना आदेश और बिना किसी वित्तीय लाभ के सेवा से हटा दिया गया। उन्हें न तो पेंशन मिली और न ही प्रोविडेंट फंड का भुगतान किया गया। ऐसे में कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।

कर्मचारी अब भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए अवमानना याचिकाओं के माध्यम से न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन न्यायालय के आदेशों को अनदेखा कर रहा है और उन्हें उनके कानूनी अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

GGU के मीडिया प्रभारी प्रो. मनीष श्रीवास्तव ने बताया कि नियमितीकरण के आदेश के बाद विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन (उपचारात्मक याचिका) दायर की है। इसके निर्णय के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। कर्मचारियों का कहना है कि प्रशासनिक अड़चन और न्यायालय के आदेशों की अवहेलना उनके जीवन और आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर डाल रही है।

यह मामला न केवल कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई है, बल्कि यह दिखाता है कि उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन न करने पर प्रशासनिक व्यवस्था कितनी लंबी और परेशान करने वाली हो सकती है। कर्मचारी न्याय पाने के लिए लगातार कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं और न्यायिक आदेशों का पालन सुनिश्चित कराने की मांग कर रहे हैं।

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