
बिलासपुर। लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर देशभर में “रन फॉर यूनिटी” का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और संगठन की शक्ति को प्रदर्शित करना था। लेकिन छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित यह आयोजन उस वक्त चर्चा का विषय बन गया जब मंच पर नहीं, बल्कि सड़क पर ही पार्टी के दो वरिष्ठ नेता आपस में भिड़ गए।

मामला मंगलवार को यूनिटी मार्च के दौरान का है, जब काली मंदिर से निकल रही यात्रा में केंद्रीय आवास राज्यमंत्री तोखन साहू, बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला और प्रदेश मंत्री हर्षिता पांडे मौजूद थे। कार्यक्रम की शुरुआत तो पूरे उत्साह और अनुशासन के साथ हुई, लेकिन जैसे ही तोखन साहू ने झंडी दिखाकर यात्रा का शुभारंभ किया, माहौल अचानक बदल गया।

बताया जा रहा है कि, विधायक सुशांत शुक्ला फर्स्ट लाइन में केंद्रीय मंत्री के साथ चलने के लिए आगे बढ़े, जबकि उस स्थान पर पहले से ही प्रदेश मंत्री हर्षिता पांडे खड़ी थीं। इसी बात को लेकर दोनों नेताओं के बीच कहासुनी शुरू हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुशांत शुक्ला ने ऊंची आवाज में कहा, “मैं यहीं चलूंगा, जिसे जो करना है कर ले,” तो वहीं हर्षिता पांडे ने भी उसी अंदाज में जवाब देते हुए कहा, “आपको जो करना है, कर लीजिए।”
देखते ही देखते दोनों के बीच बहस इतनी तेज हो गई कि बाकी नेता भी असहज हो उठे। कुछ कार्यकर्ता और पदाधिकारी तुरंत बीच में आए और स्थिति को संभालने की कोशिश की, मगर इस दौरान पूरा माहौल तनावपूर्ण हो गया। बताया जा रहा है कि खुद केंद्रीय मंत्री तोखन साहू को बीच में आकर दोनों नेताओं को शांत कराना पड़ा। उन्होंने सुशांत शुक्ला को अपनी बाईं ओर चलने का स्थान देकर स्थिति को किसी तरह संभाला।

इसके बाद यात्रा आगे तो बढ़ी, लेकिन अंदर ही अंदर खींचतान का असर पूरे कार्यक्रम में महसूस किया गया। वरिष्ठ नेता धरमलाल कौशिक और संगठन पदाधिकारियों ने बार-बार माहौल को सामान्य बनाए रखने की कोशिश की। हालांकि, घटना ने पार्टी की आंतरिक एकजुटता पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। कार्यक्रम में शामिल कई कार्यकर्ताओं का कहना था कि “एकता की दौड़” का जो संदेश जनता तक पहुंचना चाहिए था, वह “असहमति के प्रदर्शन” में बदल गया। शहर के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह वाकया पार्टी के अंदरूनी मतभेदों और शक्ति प्रदर्शन की झलक दिखाता है।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूनिटी मार्च जैसे प्रतीकात्मक कार्यक्रमों में अनुशासन और एकता का प्रदर्शन बेहद अहम होता है। ऐसे में सार्वजनिक मंच पर नेताओं का विवाद न केवल संगठन की छवि को धूमिल करता है बल्कि विपक्ष को भी हमला बोलने का मौका देता है।
हालांकि पार्टी के सूत्रों का कहना है कि मामला तूल देने लायक नहीं है और दोनों नेताओं ने बाद में आपस में बातचीत कर स्थिति स्पष्ट कर ली है। परंतु जिस तरह से यह दृश्य जनता के सामने आया, उसने “रन फॉर यूनिटी” को “रन ऑफ टेंशन” में जरूर बदल दिया।
बिलासपुर का यह वाकया इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में एकता की दिखावे से अधिक, उसकी वास्तविकता की परीक्षा सड़कों पर होती है, और मंगलवार को बीजेपी की यह परीक्षा चर्चा के केंद्र में रही।
