
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित फर्जी सर्पदंश (स्नेक बाइट) मुआवजा घोटाले में हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं। जांच में अब तक डॉक्टरों, पुलिसकर्मियों और तहसील कर्मचारियों समेत 17 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। पुलिस की जांच में सामने आया है कि कथित ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ ने स्वास्थ्य, पुलिस और राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारियों के साथ मिलकर सरकारी आपदा राहत राशि में करोड़ों रुपये का फर्जीवाड़ा किया। सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत बताकर 431 फर्जी मामलों में करीब 17.24 करोड़ रुपये का मुआवजा हासिल किया गया।

ताजा कार्रवाई में पुलिस ने CIMS पुलिस चौकी में पदस्थ रहे दो पुलिसकर्मियों रामकुमार पाटनवार (बंधवापारा, सरकंडा) और रामेश्वर भास्कर (सतनाम नगर, अमेरी) को गिरफ्तार किया है। दोनों को न्यायालय में पेश किया गया है और अब पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की जाएगी। वहीं, फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में CIMS के कई डॉक्टर फरार बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश जारी है।

ऐसे चलता था ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ का खेल
पुलिस जांच के अनुसार, जैसे ही किसी व्यक्ति का शव CIMS अस्पताल पहुंचता था, गिरोह सक्रिय हो जाता था। आरोप है कि CIMS पुलिस चौकी में तैनात कुछ पुलिसकर्मी और अन्य सहयोगी शव पहुंचने की सूचना गिरोह के सदस्यों तक पहुंचाते थे। इसके बाद गिरोह का कथित सरगना एडवोकेट हीरा खांडेकर और उसके सहयोगी मैदान में उतरते थे।
गिरोह का सदस्य महेंद्र मनहर मृतक के परिजनों से संपर्क करता था और उन्हें शासन से मिलने वाली 4 लाख रुपये की आपदा सहायता राशि का लालच देकर मौत का कारण सर्पदंश बताने के लिए तैयार करता था, जबकि कई मामलों में मौत की वास्तविक वजह कुछ और होती थी। सरकारी मुआवजे का हिस्सा मिलने के लालच में कुछ परिजन भी इस षड्यंत्र का हिस्सा बन जाते थे।

1 से 1.5 लाख रुपये में होती थी पूरी सेटिंग
जांच में यह भी सामने आया है कि तहसील कार्यालय से जुड़ा दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा कथित तौर पर 1 से 1.5 लाख रुपये लेकर पूरा मामला सेट करता था। फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेज तैयार कराकर मुआवजा प्रकरण आगे बढ़ाया जाता था। आरोप है कि सरकारी राहत राशि स्वीकृत कराने के लिए पूरी प्रक्रिया को प्रभावित किया जाता था।

फर्जी पोस्टमार्टम और दस्तावेजों से निकाला गया करोड़ों का मुआवजा
पुलिस के अनुसार, पूरे नेटवर्क ने फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मर्ग पंचनामा, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेज तैयार कर सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत साबित किया। कुछ मामलों में शवों पर सर्पदंश के निशान दिखाने के लिए छेड़छाड़ किए जाने का भी आरोप है। कई मामलों में मृतकों के परिजनों की पूरी जानकारी के बिना ही मुआवजे की राशि का बंदरबांट कर दिया गया।
दो पुलिसकर्मी निभा रहे थे मुखबिर की भूमिका
जांच में गिरफ्तार पुलिसकर्मी रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर की भूमिका बेहद अहम बताई जा रही है। आरोप है कि दोनों अस्पताल में शव पहुंचने की सूचना तुरंत गिरोह के सदस्य महेंद्र मनहर तक पहुंचाते थे। सूचना मिलते ही गिरोह के सदस्य अस्पताल पहुंचकर परिजनों को अपने झांसे में लेते और फर्जी सर्पदंश का पूरा मामला तैयार कर देते थे।

एसएसपी रजनेश सिंह बोले- रिमांड में होंगे कई बड़े खुलासे
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने बताया कि सर्पदंश मुआवजा फर्जीवाड़ा मामले की जांच पूरी निष्पक्षता और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है। जांच में मिले तथ्यों के आधार पर CIMS पुलिस चौकी में पदस्थ रहे दोनों पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया है।
उन्होंने बताया कि प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि दोनों आरोपी पुलिसकर्मी अस्पताल में शव पहुंचने की सूचना गिरोह के सदस्य महेंद्र मनहर तक पहुंचाते थे। इसके बाद मृतक के परिजनों को कथित रूप से सर्पदंश से मृत्यु का दावा करने और शासन से मिलने वाली आपदा सहायता राशि का लालच देकर फर्जी प्रकरण तैयार कराया जाता था।

एसएसपी ने कहा कि दोनों आरोपियों को पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की जाएगी। पूछताछ में पूरे नेटवर्क, आर्थिक लेन-देन, गिरोह के अन्य सदस्यों और अब तक सामने आए तथा संभावित अन्य फर्जी मामलों से जुड़े कई अहम खुलासे होने की उम्मीद है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि सरकारी योजनाओं और आपदा राहत राशि के दुरुपयोग में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। यदि जांच के दौरान पुलिस विभाग का कोई अन्य कर्मचारी, डॉक्टर, राजस्व अधिकारी या कोई बाहरी व्यक्ति भी इस षड्यंत्र में शामिल पाया जाता है, तो उसके खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
रिमांड पर टिकी सबकी नजर
दो पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के बाद यह साफ हो गया है कि यह मामला केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि सरकारी आपदा राहत व्यवस्था का सुनियोजित दुरुपयोग करने वाला एक संगठित नेटवर्क था। अब सबकी निगाहें पुलिस रिमांड पर टिकी हैं, जहां पूछताछ के दौरान इस पूरे गिरोह से जुड़े कई और चेहरे, करोड़ों रुपये के लेन-देन और नए फर्जी मुआवजा मामलों का खुलासा होने की संभावना है।
